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जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है

जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है  रामधारी सिंह दिनकर वर्षों तक वन में घूम घूम, बाधा विघ्नों को चूम चूम सह धूप घाम पानी पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर सौभाग्य न सब दिन होता है, देखें आगे क्या होता है मैत्री की राह दिखाने को, सब को सुमार्ग पर लाने को दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को भगवान हस्तिनापुर आए, पांडव का संदेशा लाये दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो तो दे दो केवल पांच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पे असी ना उठाएंगे दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की न ले सका उलटे हरि को बांधने चला, जो था असाध्य साधने चला जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया डगमग डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित हो कर बोले जंजीर बढ़ा अब साध मुझे, हां हां दुर्योधन बांध मुझे ये देख गगन मुझमें लय है, ये देख पवन मुझमें लय है मुझमें विलीन झनकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें भूतल अटल पाताल देख, गत और अनागत काल देख ये देख जगत का आदि सृजन, ये देख महाभार...

भगवान के डाकिए

भगवान के डाकिए रामधारी सिंह "दिनकर" पक्षी और बादल,  ये भगवान के डाकिए हैं जो एक महादेश से दूसरें महादेश को जाते हैं।  हम तो समझ नहीं पाते हैं मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ  पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।  ~रामधारी सिंह "दिनकर"